मंगलवार, 11 दिसंबर 2007

वाजपेयी युग के ऐसे अंत की तो नहीं ही थी उम्‍मीद


बिन मौसम बरसात की तरह सोमवार शाम एक खबर आई कि जिन्‍हावादी नेता लालकष्‍ण आडवाणी प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्‍मीदवार होंगे। इसके कई निहितार्थ और संदेश हैं।
* पहला यह कि लोकसभा के मध्‍यावधि चुनाव कभी भी हो सकते हैं।
* दूसरा.भाजपा और एनडीए की कमान लालजी के हाल होगी।
* तीसरा गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान की पूर्व संध्‍या पर ऐसी घोषणा कर यह संदेश देने की कोशिश करना कि अगला प्रधानमंत्री गुजरात से होगा। लालजी गांधीनगर से सांसद भी हैं।
* चौथी और सबसे महत्‍वपूर्ण यह कि भारत की राजनीति से वाजपेयी युग का औपचापिरक अंत हो गया है ।
* पांचवी यह कि भाजपा की कमान अब नरमपंथी हाथों से चरमपंथी हाथों में आ गई है। यह बाद दीगर है प्रधानमंत्री पद के सपने ने इन हाथों को अपने चेहरे पर जिन्‍हावाद का मुखौटा लगाने पर मजबूर कर दिया।

भरी दुपहरी में अंधियारा, सूरज अपनों से ही हारा

वाजपेयी जैसे महामना का भारतीय राजनीति के शिखर ऐसी गुमनामी से ओझिल होने की खबर की किसी को उम्‍मीद नहीं थी, खुद वाजपेयी को भी नहीं। ये वे ही वाजपेयी हैं जिन्‍होंने गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के बाद नरेन्‍द्र मोदी को सीख दी थी कि मोदीजी आपने राजधर्म का पालन नहीं किया। वे भारतीय राजनीति में नेहरू युग के अंतिम राजनेता हैं। उन्‍होंने संघ के प्रचारक, पत्रकार और राजनेता के रूप में सफलताओं और अदाओं के नए मुहावरे गढे। शब्‍दों के बाणों से सारे काम्‍पीटिटर्स को ससम्‍मान धराशायी किया। हटाने के पीछे वाजपेयीजी की ढलती उम्र, खराब सेहत और खुद उनकी रजामंदी की दुहाई दी गई। भाजपा में इतना बडा फैसला हो गया तो बडे घर यानी नागपुर की भी रजामंदी रही ही होगी। यह फैसला काफी पहले ले लिया गया था। भाजपा के संसदीय बोर्ड ने संघ के इशारे पर गुजरात चुनाव से ठीक पहले इसका ऐलान कर दिया। बेहतर होगा कि इस बात का आफिशियल ऐलान करने का मौका वाजपेयी को ही दिया जाता। आरएसएस की परंपरा तो कमसे कम ऐसा ही कहती है। आरएसएस को माई बाप मानने वालों से कम से कम इस भाईचारे की तो उम्‍मीद थी ही।
भाजपा फिर लौट रही है हिन्‍दुत्‍व की ओर
इसका मतलब यह है भी है कि भाजपा हिन्‍दुत्‍व की ओर लौट रही है। भाजपा की कमान अब नरमपंथी हाथों से चरमपंथी हाथों में आ गई है। यह बाद दीगर है प्रधानमंत्री पद के सपने ने इन हाथों को अपने चेहरे पर जिन्‍हावाद का मुखौटा लगाने पर मजबूर कर दिया था। यह तो एनडीए में स्‍वीकार्यता के लिए खेले गए प्रहसन का एक अध्‍याय भी था। पिछले लोकसभा चुनाव में शायनिंग इंडिया का नारा देने के बाद पराजय की धूल चाट चुकी भाजपा को अब फिर हिन्‍दुत्‍व और विकास के घालमेल से ही उम्‍मीदें हैं। भाजपा को लगने लगा है कि न खाली हिन्‍दुत्‍व से चुनाव जीता जा सकता हैं और न हीं सिर्फ विकास से। उन्‍हें लगा क्‍यों न दोनों का घालमेल कर दिया जाए। फिलहाल इसका लिटमस टेस्‍ट गुजरात विधानसभा चुनाव में जारी है। यही कारण है कि चरमवादी लालजी, नरमपंथी अटलबिहारी वाजपेयी के उत्‍तराधिकारी होंगे। आरएसएस को भी वाजपेयी कभी भी सूट नहीं करते थे, लेकिन सर्वस्‍वीकार्यता और गठबंधने के दौर में उसे अपने इस नरमपंथी स्‍वयंसेवक को मजबूरी में देश का सीईओ बनाना पड़ा था। भाजपा विकास के नारे के साथ हिन्‍दुत्‍व की ओर लौट रही है इसका सबसे बड़ा उदाहरण है नरेन्‍द्र मोदी। गुजरात में विकास ने नाम पर प्रचार अभियान चला रहे मोदी ने बीच प्रचार के दौरान पूर्व नियोजित तरीके से यू-टर्न लिया और सोहराबुद़दीन के बहाने भाजपा को वापस हिन्‍दुत्‍व की पटरी पर ला खडा किया। बिना संघ की हरी झंडी के मोदी इतना बड़ा कदम उठा ही नहीं सकते थे।
एक तीर से साधे कई निशाने
आडवाणी तो एक बहाना हैं। इसके बहाने कई तीर चले हैं। संघ कई दिनों से भाजपा को हिन्‍दुत्‍व की पटरी पर लाना चाह रहा था पर वाजपेयी के रहते भाजपा में यह सब संभव नहीं हो पा रहा था। अब तय है कि भाजपा का रिमोट कंन्‍टोल नागपुर केसरिया झंडे तले पहुंच गया है।
गुजरात में भाजपा में चल रही असंतुष्‍ट गतिविधियों के पीछे आडवाणी विरोधियों की शह को माना जा रहा है। भाजपा पर अपना बर्चस्‍व कामम करने के लिए मौजूदा हाईकमान राजनाथसिंह आडवाणी को कमजोर करने पर लगे हुए हैं। पिछले दिनों वे यह भी कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवारों की दौड़ मे वे भी शामिल हैं।
गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदी आडवाणी की परछाई की तरह हैं। अगर मोदी कमजोर होते हैं या गुजरात में मोदी हारते हैं तो इससे आडवाणी कमजोर होंगे और यही पार्टी आलाकमान चाहते हैं। इसी चाल को भांपते हुए आडवाणी और मोदी पिछले कई दिनों से संघ पर दबाव बनाए हुए थे कि आडवाणीजी को प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार घोषित किया जाए। पहले दौर में तो आडवाणी और मोदी ने बाजी मार ली है। अब सारा गणित गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर है। अगर मोदी जीतते है तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव और दस राज्‍यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा का तुरुफ का इक्‍का हिन्‍दुत्‍व और विकास का घालमेल ही होगा।
तब तक लालजी इसी बात से संतोष कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री न सही प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार ही सही।

रविवार, 9 दिसंबर 2007

प्रवीण तोगडिया फ्राम पाटीदार परिषद




नाम-प्रवीण तोगिडया
पद- अध्‍यक्ष गुजरात पाटीदार परिषद
जी हां वे तोगडियाजी तो वही हैं विहिप वाले पर उनके पाटीदार समाज के प्रेम ने उन्‍हें आज इस मुकाम पर ला खडा किया है ।
हिन्‍दुत्‍व के हीरो और विश्‍व हिन्‍दू परिषद के तेजाबी जुबान वाले नेता बोले तो अपने प्रवीणभाई तोगडिया इस बार गुजरात विधानसभा चुनाव के कैनवास से गायब हैं। गोधरा कांड और दगों के बाद हुए पिछले चुनाव में प्रवीण भाई तोगडिया ने मोदी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनके समर्थन में सौ से अधिक सभाएं की थीं। प्रस्‍तुत है प्रवीणभाई के गावब होने की कथा
ये कैसा‍ हिन्‍दुत्‍व
प्रवीणभाई तोगडिया मोदी विरोधी गतिविधियों से लगातार जुडे रहे। कारण कि मोदी के खिलाफ चल रहे असंतुष्‍टों के आंदोलन को प्रवीणभाई को खुले दिल से खुले तौर पर आशीर्वाद रहा है। इसका एक बडा कारण उनका पाटीटार होना भी रहा है बुजुर्गवार भाजपी नेता केशुभाई भी इसी पाटीदार समाज को बिलांग करते हैं। सरदार पटेल उत्‍क़र्ष समिति के बैनर तले सौराष्‍ट में हुए असंतुष्‍टों के सम्‍मेलनों को भी हमारे इस हिन्‍दूवीर ने संबोधित किया था।
प्रवीणभाई को हिन्‍दुत्‍व का डोज
असंतुष्‍टों के अगुवा प्रवीणभाई की इस हरकत के बारे में जब आरएसएस मुख्‍यालय और भाजपाई कंमाडर को खबर लगी तो उन्‍हें मुम्‍बई तलब किया गया। वहां उन्‍हें संघ के नेता मोहन भागवत, जिन्‍हावादी नेता आडवाणी और बीजेपी सुप्रीमो राजनाथसिंह ने हिन्‍दुत्‍व का कोरामिन डोज दिया गया। उन्‍हें याद दिलाया गया कि वे मात्र पाटीदार समाज ही नहीं समग्र हिन्‍दू समाज के नेता हैं लिहाजा पाटीदार समाज विशेष के मच पर जाकर एक प्रो हिन्‍दू सरकार के मुखिया को हटाने की गतिविधियों में शामिल होना उनके कद के नेता को शोभा नहीं देता है।
पाटीदार समाज के नेता हैं या हिन्‍दु परिषद के
अभी तक प्रवीणभाई हिन्‍दुत्‍व का कोरामिन डोज विहिप कार्यकर्ताओं को लगाया करते थे उसी का प्रयोग मुम्‍बई में उन्‍हीं पर हो गया। पेशे से कैंसर के डाक्‍टर प्रवीणभाई के पास हथियार डालने के अलावा और कोई दूसरा चारा नहीं बचा था। उन्‍होंने नेताओं की तिकडी को वचन दिया कि वे चुनाव तक गुजरात का मुंह भी नहीं करेंगे और वे रामसेतु के लिए जागित अभियान में लग जाएंगे।
गुजरात से दूर रहने की सौदेबाजी
खैर इसके बाद प्रवीणभाई सीधे तौर पर मोदी विरोधी अभियान से दूर हो गए पर परदे के पीछे कठपुतलियों का नाच जारी है। प्रवीणभाई को इसका सिला भी तुरंत ही मिल गया। राजस्‍थान की भाजपी सरकार ने उनके खिलाफ अजमेर में दर्ज त्रिशूल दीक्षा का मामला वापस ले लिया। जैसा कि सभी जानते हैं लगभग पांच साल पहले अजमेर में त्रिशूल दीक्षा के कार्यक्रम कांग्रेस की तत्‍कालीन अशोक गहलोत सरकार ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था। उसके बाद से समुद्र का काफी पानी बह गया। इस दौरान वहां भाजपा की सरकार भी बन गई पर मामला था कि वापस लेने का नाम ही नहीं ले रहा था। अब बोलियो यह कैसी सौदेबाजी रही।
महत्‍वाकांक्षा के बीज
संघ परिवार और भाजपा के शीर्ष नेताओं में एक बार इस बात पर विचार किया था कि क्या गुजरात का नेतृत्व प्रवीण तोगड़िया को सौंप देना चाहिए ? यह प्रस्ताव तोगड़िया तक भी गया था. लेकिन उनका कहना था कि वे तो विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव हैं और एक छोटे से राज्य का नेतृत्व उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है बाद में उन्‍हें अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्‍हें लगा कि ये तो उन्‍होंने हाथ में आई थाली छोड दी है।
राजनीति का विहिप
गुजरात चुनाव में मोदी और हिन्‍दुत्‍ववादी ताकतों को मजबूत करने के प्रस्‍ताव के तोगिडया की विहिप दूर क्‍यों हैं? लाख टके का सवाल सारे हिन्‍दुओं के मन में घूम रहा है। पाटीदार समाज की खातिर प्रवीणभाई ने क्‍यों विश्‍व हिन्‍दू परिषद की विचारधारा को भी ताक पर रख दिया है? विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्‍यक्ष अशोक सिंहल ने मोदी को समर्थन क्‍या दिया प्रवीण भाई समर्थक संत नाराज हो गए। सवाल यह है कि हिन्‍दूओं के हित ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण हैं या प्रवीणभाई या नरेन्‍द्रभाई या केशुभाई का ईगो? क्‍या हिन्‍दूओं के व्‍यापक हितों के लिए इस यादवी घमासान को कुछ देर के लिए रोका नहीं जा सकता? यह बात मैं सिर्फ और सिर्फ इसलिए कर रहा हूं इन सारे महानुभावों की दुकानदारी हिन्‍दुत्‍व के नाम पर चलती है। दरअसल प्रवीणभाई की नजर बडे ही दिनों से सिंधल साहब की कुरसी पर है इस बहाने प्रवीणभाई को मौका मिल गया । पर अशोक सिंघल ने गुजरात में विहिप मार्गदर्शक मंडल के सदस्‍य और पंचखंडपीठाधीश्‍वर आचार्य धर्मेन्‍द्र को मैदान में उतरकर उनकी कुरसी के पीछे एक दावेदार लगा दिया है। आचार्य धर्मेन्‍द्र प्रवीणभाई से भी तेजाबी जुबान रखते हैं।
गौर करे
माना कि इन चुनावों मोदी हार गए और फिर दंगा हो गया------
सवाल- इसका जिम्‍मेदार कौन
जवाब- प्रवीण तोगडिया
बहुत कर ली सियासल अपनी-अपनी
अब जरा सुध ले लो हिन्‍दुओं की

मौत का सौदागर - कांग्रेस हुई पस्‍त, मोदी



गुजरात में कांग्रेस एक बार पुन: मोदी के जाल में फंस गई. मोदी की डेवलपमेंट एक्‍सप्रेस वि‍कास की पटरी से हिन्‍दुत्‍व की पटरी पर बारास्‍ता शोराबुद़दीन आ ही गई। मोदी को सोनिया ने मौत का सौदागर कह - कह कर खूब उकसाया जैसे कि लेग ब्रेक स्‍पिनर बल्‍लेबाज को अपनी फ़लाइटेट गेंद से क्रीज के बाहर निकालने की कोशिश करता है । मोदी ने इस बार ऐसा सिक्‍सर मारा कि कांग्रेस की सिटटी पिटटी गुम हो गई. विकास के नारे से साथ मोदी ने फिर से साम्‍प्रदायिक ध्रुवीकरण का जो धोबी पछाड दांव मारा उससे कांग्रेस तमतमाती नजर आ रही है।
ये किस्‍सा है दूध के जलों का, हम छांछ को
भी फूंक-फूंक कर पिया करते हैं


सोनिया को करारा जवाब
मोदी ने गोधरा की सभा में बड़ी ही चतुराई से सोनिया को राजनीतिक जवाब देते हुए जनता के मुंह से यह कहला ही दिया कि शोहराबुददीन जैसों का तो एनकाउन्‍टर ही होना चाहिए । मोदी के इस बयान को टाइम्‍स आफ इंडिया के अमदाबाद संस्‍करण ने अपने हिसाब से इंटरपिटेट कर छापा फिर क्‍या था तिस्‍ता सितलवाड स‍हित सारे मोदी विरोधी चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट में पंहुच गए । मानो मोदी को इसी घडी का इंतजार हो । मोदी को चुनाव आयोग ने नोटिस भी फटकार दिया । मारे चुनाव आयोग के डर के कि कहीं मौत के सौदागर वाली टिप्‍पणी सोनिया को भारी नहीं पड जाए कांग्रेस के बडबोले नेता क‍पिल सिब्‍बल ने कहा कि सो‍निया गांधी ने मौत के सौदागर शब्‍द़ का इस्‍तेमाल मोदी के लिए गुजरात के प्रशासन के लिए किया था। नहीं किया था ।


मौत का सौदागर कौन

शोहराबुददीन पर मोदी के बयान से जहां भाजपा को फायदे की बात चल पड वहीं मौत के सौदागर वाले मामले में कपिल सिब्‍बल के बयान से मुसिलम कुछ नाराज से लगे । इतने में कांग्रेस के दूसरे प्रवक्‍ता अभिषेक मनु सिंघवी ने यह कहकर सिब्‍बल की बात काट दी कि सोनियाजी ने मौत के सौदागर शब्‍द का उपयोग नरेन्‍द्र मोदी के लिए ही किया थात्र अब राम जाने सिब्‍बल सही हैं या सिंघवी। अब अगर सिंघवी साहब की बात को सही मानें तो सिब्‍बल साहब गलत हैं और सिब्‍बल साहब के बयान का दूसरा पक्ष देखें तो उसमें उन्‍होंने कहा कि मौत के सौदागर शब्‍द का इस्‍तेमाल तो गुजरात के प्रशासन के लिए था । प्रशासन बोले तो चीफ सेक्रेटरी और चीफ सेक्रेटरी पदनाम के नीचे लिखा होता है कि फलां- फलां राज्‍य के राज्‍यपाल के नाम से आदेशानुसार तो फिर क्‍या’---------।
अब इनके बारे में यही कहा जा सकता है कि


ये बदल से नहीं जेहन से अपाहिज हैं,
बहीं कहेंगे जो रहनुमा बताएगा


शेषन चिरायु हो
तत्‍कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने चौदह साल पहले जब चुनाव सुधार का बीड़ा उठाया था तब उन्‍हें खुद भी उम्‍मीद नहीं होगी कि अगले एक दशक में चुनाव प्रचार की तस्‍वीर इतनी बदल जाएगी। गुजरात के चुनाव इसकी एक ताजा बानगी हैं। कच्‍छ से चोर्यासी तक, पावागढ से अम्‍बाजी तक और पोरबंदर से भरूच तक किसी भी शहर,गांव और कस्‍बे में चले जाइए पहले के चुनाव की तुलना में एक सन्‍नाटा सा पसरा दिखाई देता है। कुछ साल पहले चुनाव में ऐसी मुर्दा शांति की कल्‍पना तक नहीं की जा सकती थी।
अगर सत्‍तर से नब्‍बे के दशक के चुनाव के बारे फिल्‍मी फ़लेश बेक की तरह सोचें तो- पता चलता है कि उस दौरान किस तरह शहर की हर दीवार चुनावी नारों और हर खंभा बैनर से पट जाता था। भौंगे बोले तो लाउडस्‍पीकर का कानफोडू शोर और रैलियों की रेलमपेल बाप रे बाप। इन सब के बीच शहर की गलियों से गुज़रते कितना मुश्‍िकल हुआ करंता था।
जिन ढीठ राजनेताओं पर नकेल डालना किसी के बस में नहीं था उन्‍हे स्‍कूली बच्‍चों के मानिंद आज्ञाकारी बनाने का श्रेय चुनाव आयोग को जाता है। इसलिए सलाम हैं इस परंपरा के वाहक टीएन शेषन को ।
संदेश
संदेश साफ है कि संवैधानिक संस्थाएँ अगर अपने अधिकारों का ठीक-ठीक इस्तेमाल करें तो इस देश में परिस्थितियाँ बदल सकती हैं।


कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता,
एक पत्‍थर तो तबियत से उछालो यारो

शनिवार, 8 दिसंबर 2007

मुन्ना सरकिट संवाद

सरकिट : भाई, ये अमेरिका का दुकानदार अपुन को भोत चीट किया। मुन्ना : क्यों क्या हुआ सरकिट?सरकिट: भाई वो अपुन को बोला कि ये रेडियो अमेरिका में बना है मगर ये इदर आके बोलता ये आल इंडिया रेडिया है।

मुन्ना भाई: सरकीट, तुम अपने नये जॉब में पइलेच दिन लेट नाईट तक काम किया? नया जॉब भोत पसंद आया तेरे कू?सरकित: अरे भाई, उदर कंप्यूटर के कीबोर्ड में ए बी सी सही ऑर्डर में नहीं लगा था उसी को सही करते करते इतना टैम लग गया।

मुन्नाभाई: अरे सरकिट आज तो जाह्न्वी के सामने अपुन की वाट लग गयी।सरकिट :क्या हुआ भाई?मुन्नाभाई: वो बोली कि अपनी अंगेजमेंट पर तुम मेरेकु रिंग देगा ना, तो मैं बोला श्योर रिंग देगा तुम बताओ लैंडलाईन पर या मोबाइल पर।

मुन्ना : अरे सरकिट गाड़ी में बम ध्यान से लगा, कहीं लगाते लगाते ही न फट जाये।सरकिट: चिंता मत कर भाई, अपुन के पास एक और बम है।

मुन्ना: अरे सरकिट तेरा बर्थडे कब का है?सरकिट: तेरह अक्टूबरमुन्ना: कौन से साल?सरकिट : भाई, हर साल।

मुन्ना: अरे सरकिट, गाड़ी के व्हील काये को उतार रहा है?सरकिट: भाई देखता नहीं है इदर लिखेला है कि पार्किंग फॉर टू व्हीलर्स ओन्ली।

मुन्ना: सरकिट इस गाड़ी का नाम क्या है।सरकिट : पता नहीं भाई, मगर टी से स्टार्ट होता है।मुन्ना: बड़ी कमाल की कार है भाई, अपुन का कार तो पैट्रोल से स्टार्ट होता है।

मुन्ना: भाई, अगर दुशमन का पनडुब्बी आयेंगा तो उसे कैसे मारेंगे?सरकिट: भोत सिंपल है भाई, जाके बस दरवाजे पर नॉक करने का, वो उसे खोल देंगे।

मुन्ना: कमाल की बात है सरकिट इदर अमेरिका में इमेल से भी शादी होती है।सरकिट: पर भाई अपन के उदर तो सिर्फ फीमेल से ही शादी होती है।
(एक पुरानी मेल पर आधारित)

गुरुवार, 6 दिसंबर 2007

बेगानी शादी में म्यूजिक का 'आनंद'


अगर यह देखना हो कि इस देश में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की किस तरह धज्जियां उड़ाई जाती हैं तो आप शादी के इस सीजन में किसी भी एक शादी में चले जाएं। आप पाएंगे कि हर जगह रात 10 बजे , 11 बजे , 12 बजे के बाद भी लाउड म्यूजिक बज रहा है। चाहे कम्यूनिटी सेंटर हो या पार्क या फिर फार्म हाउस , कहीं भी इस कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं हो रहा कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी तरह का शोर नहीं किया जा सकता , क्योंकि यह सोने का समय है। कोई इस कानून और आदेश को नहीं मान रहा। नतीजा यह कि आसपास रहने वाले लोग परेशान हो रहे हैं। वे पुलिस में शिकायत करते हैं तो वहां से जवाब मिलता है , भाई साहब , ' अब फंक्शन में तो गाना - बजाना होता ही है। अगर आपके यहां शादी हो तो क्या आपको अच्छा लगेगा कि आपके यहां पुलिस आए। ' कोई कहता है कि रात 12 बजे के बाद बंद करवाएंगे। उन्हें भ्रम है कि रात 12 बजे तक लाउडस्पीकर बजाना अलाउड है। वैसे इन पुलिसवालों को भी क्या कहें ! एसएसपी लेवल के अधिकारी कहते हैं कि लाउडस्पीकर बंद करना या अलाउ करना डीएम का काम है। एसपी से शिकायत करें तो उनका कहना है कि खुद मेरे घर के सामने म्यूजिक बज रहा है , मैं क्या कर सकता हूं ? और तो और , सारे नेता , अधिकारी और मंत्री ऐसे आयोजनों में जाते हैं और उनके ही सामने यह सारा तमाशा होता रहता है , लेकिन कहीं कोई रोक नहीं। ऐसी स्थिति में आम नागरिक बस परेशान होता रहता है और तब तक जागता रहता है जब तक गाना - बजाना बंद नहीं हो जाता। यह शुभ घड़ी कभी रात के 12 बजे , कभी 1 बजे और कभी 2 बजे तक भी आ सकती है। जागते - जागते वह बस यही सोचता है कि दिनभर की मेहनत के बाद रात को शांति से सोने के अपने अधिकार को बचाने के लिए किसका दरवाजा खटखटाए। वह सुप्रीम कोर्ट के जज को तो फोन नहीं कर सकता , न ही होम मिनिस्टर के टेलिफोन की घंटी घनघना सकता है। वह रात को सिर्फ 100 नंबर पर फोन कर सकता है। लेकिन जिस पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह कानून का पालन करवाए , जब वही कानून तोड़ने वालों का साथ देती है , तो उसके पास कोई चारा नहीं बचता। इस बारे में आप क्या सोचते हैं ? क्या आपको लगता है कि इस मामले में कुछ किया जा सकता है ?

मोदी एक्सप्रेस विकास के ट्रैक से हिंदुत्व के ट्रैक पर


मोदी चुनावी रैलियों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे हैंगुजरात में विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मसले पर एक टिप्पणी ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि मोदी एक्सप्रेस विकास के ट्रैक से हिंदुत्व के ट्रैक पर aरही है.मंगलवार को एक चुनाव सभा में नरेंद्र मोदी ने सोहराबुद्दीन के गुजरात पुलिस के हाथों मारे जाने को सही ठहराया है.रिपोर्टों के अनुसार 26 नवंबर 2005 को गुजरात पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) और राजस्थान पुलिस की एक मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन शेख़ मारे गए थे.इस मामले में तीन आईपीएस अधिकारियों - डीजी वंज़ारा, राजकुमार पांडियन और दिनेश कुमार एमएन को गिरफ़्तार किया गया था जो अभी न्यायिक हिरासत में हैं.बाद में गुजरात पुलिस ने अदालत में स्वीकार किया कि कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारे गए सोहराबुद्दीन शेख़ की पत्नी क़ौसर बी की हत्या हो चुकी है और उसके शव को जला दिया गया था.मामले की जाँच फिलहाल गुजरात की अपराध जाँच शाखा यानी सीआईडी कर रही है.कांग्रेस ने सोहराबुद्दीन शेख़ मामले पर नरेंद्र मोदी की टिप्पणी को 'तानाशाह रवैया' क़रार दिया है और समाजवादी पार्टी ने कहा है कि ऐसे व्यक्ति को क़ानून और संविधान में कोई विश्वास नहीं है और उसे किसी ज़िम्मेदारी के पद पर नहीं होना चाहिए.पर्यवेक्षकों के अनुसार भाजपा ने जब चुनाव अभियान शुरू किया था तब वो विकास की बात कर रही थी लेकिन पार्टी असंतुष्टों और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की रैलियों के बाद भाजपा ने आतंकवाद और हिंदुत्व का राग अलापना शुरू कर दिया है.'आतंकवाद' का रागटीवी चैनलों ने एक रैली के दौरान मोदी को सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मसले पर यह कहते हुए दिखाया, "जिस सोहराबुद्दीन पर आतंकवादी वारदातों में शामिल होने का आरोप हो, जिस सोहराबुद्दीन को चार-चार राज्यों की पुलिस खोज रही हो, उसके साथ कैसा सलूक होना चाहिए?"लोगों को तय करना है कि ऐसे मुख्यमंत्री का क्या करना है जो तानाशाह है और जिसे मानवाधिकारों के हनन पर किसी तरह का अफ़सोस नहीं हैअभिषेक सिंघवी, प्रवक्ता, कांग्रेसमोदी ने सोहराबुद्दीन की पत्नी की पुलिसवालों के हाथों कथित हत्या के बारे में कुछ नहीं कहा.मोदी ने चुनावी सभा में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार को चुनौती दी कि 'अगर वह उन्हें दोषी मानती है और अगर उसमें दम है तो वह उन्हें फाँसी दे दे.'आरोप-प्रत्यारोपइस बीच, कांग्रेस ने मोदी की सोहराबुद्दीन मुठभेड़ पर की गई टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.भाजपा गुजरात में विचारधारा, नेतृत्व और विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़ रही है. लेकिन आतंकवाद भी देश के सामने बड़ा मुद्दा है और अगर मोदी इसे उठा रहे हैं तो इसमें गलत क्या हैजावडेकर, प्रवक्ता, भाजपाकांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि भाजपा को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि क्या वह मोदी की टिप्पणी से सहमत है.उन्होंने कहा, "जो मुख्यमंत्री लोगों से सवाल पूछते हैं कि क्या पुलिस को सोहराबुद्दीन को नहीं मारना चाहिए था... लोगों को ही तय करना है कि ऐसे मुख्यमंत्री का क्या करना है जो तानाशाह है और जिसे मानवाधिकारों के हनन पर किसी तरह का अफ़सोस नहीं है."दूसरी ओर, भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहा कि कांग्रेस का हाल अजीब है - 'जब मोदी आतंकवाद की बात करते हैं तो वे कहने लगते हैं कि मोदी विकास की बात नहीं कर रहे और विकास की बात करने पर कहते हैं कि वे अन्य मुद्दों से बच रहे हैं.'उन्होंने कहा, "भाजपा गुजरात में विचारधारा, नेतृत्व और विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़ रही है लेकिन आतंकवाद भी देश के सामने बड़ा मुद्दा है और अगर मोदी इसे उठा रहे हैं तो इसमें ग़लत क्या है."

जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले

भारत में उत्तर प्रदेश हिंदी-उर्दू साहित्य की दृष्टि से बड़ा अमीर प्रांत है.
इसके हर नगर की मिट्टी में वह इतिहास सोया हुआ है, जिसको जाने बग़ैर न देश की सियासत को समझा जा सकता है और न इसकी संस्कृति विरासत को समझा जा सकता है.
राही मासूम रज़ा ने इसे 52 बेटों की माँ की उपमा से याद किया है. 52 कस्बों के इस प्रांत के एक नगर में कुछ दिन पहले मेरा जाने का इत्तिफाक़ हुआ था. शहरनुमा इस छोटी सी बस्ती बिजनौर में मुशायरा था. मुशायरे से पहले बस्ती में मुझे इधर-उधर धुमाया जा रहा था. मैं बातों में व्यस्त था-आँखें सुनने वालों के चेहरे पर थी और ज़मीन पर चल रहे थे पाँव.
रास्ता उत्तरप्रदेश के हर नगर की तरह मजनूँ के रेगिस्तान जैसा था जिस पर चलना आसान नहीं था. अचानक ठोकर लगी, पत्थर ने रोक कर चलते हुए क़दमों से मेरा नाम पूछा था. पैरों में जुबान नहीं थी...वे खामोश रहे. बस पत्थर मियाँ नाराज़ हो गए...मैं लड़खड़ा गया तो साथ वाले ने सहारा दिया और मुस्कुराते हुए कहा, "हुज़ूर यह बिजनौर है...यहाँ हर चीज़ क़ाबिले गौर है."
इस पत्थर की नाराज़गी पर मुझे अपना एक शेर याद आया,
पत्थरों की भी जुबाँ होती हैं दिल होते हैंअपने घर के दरो-दीवार सजा कर देखो
सर सैयद अहमद खाँ के साथी शिब्ली नौमानी ने इस्लाम के पैगम्बर हज़रत मोहम्मद की आत्मकथा की पहली किताब, 'सीरतुन्नबी' के नाम से लिखी थी. इस किताब के चौथे संकलन में एक हदीस के हवाले से लिखा है, "हज़रत मोहम्मद ने एक शाम की यात्रा में एक पत्थर को देखकर फरमाया था-मैं इस पत्थर को पहचानता हूँ जो पैगम्बरी से पहले मुझे सलाम किया करता था."
बिजनौर के रास्ते के पत्थर ने मुझसे भी बात की थी. लेकिन मैं ठहरा एक साधारण इंसान. उसकी बात पर ध्यान नहीं दे पाया और उसने क्रोध में आकर मुझे ठोकर मार दी...ख़ैर मैंने उस पत्थर को मुआफ़ कर दिया क्योंकि वह उस नगर का पत्थर था जहाँ कभी मिर्ज़ा ग़ालिब के प्रख्यात आलोचक अब्दुर्रहमान बिजनौरी रहते थे.
ग़ालिब के संबंध में उनका एक वाक्य काफ़ी मशहूर हुआ, "भारत में दो ही महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं, वेद मुकद्दस (पावन) और दूसरा दीवाने ग़ालिब." पता नहीं अब्दुर्रहमान बिजनौरी को वेदों की संख्या का ज्ञान था या नहीं. लेकिन एक पुस्तक की चार ग्रंथों से तुलना तर्क संगत नहीं लगती. फिर भी यह वाक्य बिजनौर के एक क़लमकार की कलम से निकला था और पूरे उर्दू-संसार में मशहूर हुआ.
ग़ज़ल का संसार
इस नगर के साथ दूसरा नाम जो याद आता है वह हिंदी ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार का है.
दुष्यंत नाम के दर्शन पहली बार महान नाटककार कालीदास की नाट्य रचना 'शाकुंतलम' में होते हैं. उसमें यह नाम एक राजा का था, जो शकुंतला को अपने प्रेम की निशानी के रूप में एक अंगूठी देकर चला जाता है. और शकुंतला की जीवन यात्रा इसी अंगूठी के खोने और पाने के इर्द-गिर्द धूमती रहती है, उज्जैन नगरी के राजा दुष्यंत के सदियों बाद बिजनौर की धरती ने एक और दुष्यंत कुमार को जन्म दिया.
इस बार वह राजा नहीं थे, त्यागी थे. दुष्यंत कुमार त्यागी. इस दुष्यंत कुमार त्यागी के पास न राजा का अधिकार था, न अंगूठी का उपहार और न ही पहली नज़र में होने वाला प्यार था. 20वीं सदी के दुष्यंत को कालीदास के युग की विरासत में से बहुत कुछ त्यागना पड़ा. इस नए जन्म में वह आम आदमी थे. आम आदमी का समाज उनका समाज था. आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना उनका रिवाज़ था. आम आदमी की तरह उनकी मंजिल भी सड़क, पानी और अनाज था.
इस आम आदमी का रूप उनके शेरों में कुछ इस तरह है-
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिएअब हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
इस नुमाइश में मिला वह चीथड़े पहने हुएमैंने पूछा कौन, तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ.
यहाँ तक आते-आते सूख जाती है कई नदियाँहमें मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिएकहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
ये सारे शेर उन ग़ज़लों के हैं जो उनकी ग़ज़लों के संग्रह ‘साए में धूप’ में है.
यह पुस्तक उनके जीवन (जन्म-1933, मृत्यु-1975) की आख़िरी पुस्तक है. इन ग़ज़लों तक आते-आते वह नई कविता, नाटक और उपन्यासों की कई कृतियों से गुज़र चुके थे. इन कृतियों में 'एक कंठ विषपायी', 'सूर्य का स्वागत', 'आवाज़ों के घेरे', 'जलते हुए वन का बसंत', 'छोटे-छोटे सवाल' और दूसरी गद्य तथा कविता की किताबें शामिल हैं.
हैदराबाद के लोकप्रिय प्रगतिशील शायर मख़दूम मुहउद्दीन ने कहा था, "शायर को ग़ज़ल उम्र के कम से कम 40 साल पूरे करके शुरू करनी चाहिए." मख़दूम ने इशारे में ग़ज़ल विधा के संबंध में बहुत अहम बात कही है. इसके द्वारा उन्होंने ग़ज़ल में ख़याल की खपत, इस खपत में शब्दों की बुनत और इस बुनत में ध्वनियों की चलत को आईना दिखाया गया है. ग़ज़ल विचार भी है और अभिव्यक्ति का मैयार भी.
दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है

दुष्यंत साहित्य में बहुत कुछ कर के और जीवन की बड़ी धूप-छाँव से गुज़र के ग़ज़ल विधा की ओर आए थे. दुष्यंत जिस समय ग़ज़ल संसार में दाखिल हुए उस समय भोपाल प्रगतिशील शायरों-ताज भोपाली और कैफ भोपाली की ग़ज़लों से जगमगा रहा था, इनके साथ हिंदी में जो आम आदमी अज्ञेय के ड्राइंगरूम से और मुक्तिबोध की काव्यभाषा से बाहर कर दिया गया था. बड़ी खामोशी से नागार्जुन और धूमिल की 'संसद से सड़क तक' की कविताओं में मुस्कुरा रहा था. इसी जमाने में फ़िल्मों में एक नए नाराज़ हीरो का आम आदमी के रूप में उदय हो रहा था.
दुष्यंत की ग़ज़ल के इर्द-गिर्द के समाज को जिन आँखों से देखा और दिखाया जा रहा था वह वही आदमी था जो पहले कबीर, नज़ीर और तुकाराम के यहाँ नज़र आया था, जिसने नागार्जुन और धूमिल के शब्दों को धारदार बनाया था. उसी ने दुष्यंत की ग़ज़ल को चमकाया था.
दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है.
विषय की तब्दीली के कारण, उनकी ग़ज़ल के क्राफ्ट में भी तब्दीली नज़र आती जो कहीं-कहीं लाउड भी महसूस होती है. लेकिन इस तब्दीली ने उनके ग़ज़ल को नए मिज़ाज के क़रीब भी किया है.
दुष्यंत ने केवल देश के आम आदमी से ही हाथ नहीं मिलाया उस आदमी की भाषा को भी अपनाया और उसी के द्वारा अपने दौर का दुख-दर्द गाया...
जिए तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तलेमरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए निदा fazali