बुधवार, 5 दिसंबर 2007

डिक्शनरी में जुड़ जाते हैं नए-नए शब्द


सेलेबूटैन्टीज़ (celebutantes), लीफ़ पीपर्स (leaf peepers), हूडीज़ (hoodies) और वैग्स (wags) में क्या समान है. यह सारे शब्द कॉलिन्स की अंग्रेज़ी डिक्शनरी के जून में प्रकाशित नए एडीशन में शामिल हैं.
कॉलिन्स का यह नया एडीशन इसका नवां संस्करण हैं. इस में सैंकड़ों नए शब्दों को जगह दी गई है. आप को अंग्रेज़ी के नए शब्दों और महावरों से रुबरु कराने के लिए हम लाए हैं कुछ ऐसे ही शब्द जो कुछ दिनों से प्रयोग में तो थे लेकिन शब्द-कोश में इनको शामिल नहीं किया गया था.
सच तो यह है कि हर वर्ष हज़ारों नए शब्द जन्म लेते हैं लेकिन उनमें से चंद ही को डिक्शनरी में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हो पाता है.
आप सोचते होंगे कि आख़िर नए शब्दों को डिक्शनरी में किन बुनियादों पर शामिल किया जाता होगा. इसका उत्तर ज़रा मुश्किल है लेकिन यह तय है कि ढ़ाई अरब शब्दों के डाटा-बेस को बहुत बारीकी से छान-बीन करने के बाद ही नए शब्द शामिल किए जाते है.
यह सारे शब्द अख़बारों, पत्रिकाओं, किताबों, वेबसाईट्स, रेडियो और टीवी के ट्रांसक्रिप्ट्स से इकठ्ठे किए जाते हैं.
इन में सबसे ज़्यादा ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि इसे कितना और किस रूप में प्रयोग किया जा रहा है.
कुछ नए शब्द
आज के हमारे शब्द हैं ब्रेनफ़ूड (Brainfood), सेलेबूटैन्टीज़ (Celebutantes), एक्सरगेमिंग (Exergaming) जिटमो (Gitmo), हूडीज़ (Hoodies), लीफ़ पीपर्स (Leaf peepers), मैन-बैग (Man-bag), मैन फ़्लू (Man flu), मफ़िन टॉप (Muffin top), और वैग्स (Wags)
नए फ़ैशन के आने के बाद छोटी चोट या कमर से नीचे सरकती जींस या लो वेस्ट जींस के उपर नज़र आने वाले उभार को बयान करने के लिए हो सकता था कि आप को कोई शब्द नहीं मिलता लेकिन मफ़िन टॉप के आने के बाद से यह मुश्किल भी हल हो गई. यानी मफ़ीन टॉप उस मोटाई या चरबी को कहा जाता है जो स्कर्ट या कमरबंद के ऊपर नज़र आए.
सेलेबूटैन्टीज़ अमीर घराने की ऐसी नवयुवतियों और सुंद्रियों के लिए प्रयोग किया जाता है जो बिना किसी ख़ासियत के प्रसिद्ध हों.
इस संदर्भ में जेमाइमा गोल्डस्मिथ को ले सकते हैं जिनकी शादी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी इमरान ख़ान से हुई थी. शायद सेलेबूटैन्टीज़ के कारण ही साइज़ ज़ीरो (size zero), शब्द का प्रचलन हो गया हो जिसका प्रयोग बहुत दुबली पतली युवतियों के लिए होता है. आपने हाल ही में पढ़ा होगा कि कई अंतरराष्ट्रीय फ़ैशन शो से बहुत पतली मॉडलों को हटा दिया गया था वैसी ही युवतियों के लिए साइज़ ज़ीरो (size zero), का प्रयोग किया जाता है.
फ़ैशन की दुनिया से ही आने वाला शब्द है मैन-बैग (man-bag) जोकि स्त्रियों के हैंडबैग की जगह पुरूषों के लिए होता है.
इंग्लैंड की फ़ूटबॉल टीम के खिलाड़ियों की पत्नी और गर्लफ़्रेंडस के लिए वैग शब्द सामने आया था और इसे काफ़ी लोकप्रियता मिली जिसके कारण इसे इस बार कॉलिन्स की डिक्शनरी में शामिल कर लिया गया. अभी तक तो यह शब्द फ़ूटबाल खिलाड़ियों की पत्नी और गर्लफ़्रेंड के लिए प्रयोग होता है, क्या मालूम आने वाले दिनों में क्रिकेट और अन्य खेलों के खिलाड़ियों की पत्नी और गर्लफ़्रेंड के लिए भी यह इस्तेमाल होने लगे.
यह शब्द प्रथमाक्षरी नाम यानी ऐक्रोनिम की तरह बना है. किसी और बैठक में हम ऐसे शब्दों पर भी विचार करेंगे.
मुहावरों का जन्म
लीफ़ पीपर्स ऐसे पर्यटकों को कहा जाता है जो ठंडे इलाक़ों में पतझड़ के मौसम को सराहने के लिए जाते हैं. दुनिया भर में पर्यावरण में आने वाले बदलाव को लेकर जो चिंता है उसने कॉरबन फ़ूटप्रिंट, कॉरबन ऑफ़सेट्टिंग और सीज़न क्रीप जैसे मुहावरों को जन्म दिया जिसे पर्यावरण में आने वाले बदलाव के कारण मौसम के चक्र में आने वाले बदलाव के लिए प्रयोग किया जाता है.
हूडीज़ ऐसे नौजवानों को कहा जाता है जो टोपी वाले जैकेट या टी-शर्ट का प्रयोग करते हैं ताकि चेहरा ठीक से नज़र न आए, वे संदिग्ध मालूम पड़ते हैं.
एक्सगेमिंग (exergaming) ऐसे वीडियो गेम के खेलने को कहा जाता है जिस में कठिन शारिरिक व्यायाम शामिल हो, दुनिया भर में मोटापे से जूझ रहे लोगों के लिए तरह तरह के व्यायाम के आने के कारण यह शब्द हमारे प्रयोग में आया.
मैन फ़्लू किसी पुरूष के ऐसे ज़ुकाम को कहा जाता है जिसे सहानुभुति पाने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर बयान किया जाए हालांकि वह ज़ुकाम साधारण ही होता है.
ब्रेनफ़ूड ऐसे पदार्थ को कहते हैं जिस के बारे में ख़्याल किया जाता है कि इस से बुद्धि में वृद्धि होती है, इस में सिर्फ़ स्वस्थ खाना ही शामिल नहीं है इसमें संगीत वाद का बजाना, कोई विदेशी भाषा सीखना, पहेली या सूडोकू सुलझाना, शतरंज या दूसरा खेल खेलना भी शामिल है.
बदलते माहौल में नए शब्द
तो आपने देखा कि किस प्रकार नए शब्द बदलते परिप्रेक्ष्य में सामने आते हैं चाहे वह फ़ैशन हो, खेल हो, पर्यावरण हो या फिर आतंकवाद हो . 9/11 और 7/7 या फिर बेसलान वग़ैरह भी इसी सूची में शामिल हैं.
11 सितम्बर को अमरीका पर होने वाले हमले के लिए 9/11 का प्रयोग करते हैं तो सात जूलाई को इंग्लैंड में होने वाले बम बिस्फोट के लिए 7/7 का प्रयोग करते हैं इसी प्रकार रूस के बेसलान में 2004 में स्कूल के बच्चों को बंदी बनाने के लिए बेसलान का प्रयोग किया जाता है.
लंदन में आतंकवादी गतिविधियों की मौजूदगी के कारण एक और शब्द आया है जिसे लंदनिस्तान कहते हैं.

किस को मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं


ग़ज़नी, अफ़ग़ानिस्तान के एक इलाक़े का नाम है. फिराक़ के गोरखपुर, जिगर के मुरादाबाद की तरह महमूद ग़ज़नवी भी अपने नाम के साथ ग़ज़नी जोड़ता था.
वह नस्ल से तुर्क था, जिसने जीसस के हज़ार साल बाद ग़जनी में अपनी हुकूमत स्थापित की थी. महमूद ने भारत पर कई बार हमले किए, लेकिन इन हमलों का संबंध धर्म से कम और लूटमार के अधर्म से ज़्यादा था.
वह नाम से मुसलमान ज़रूर था, लेकिन हक़ीक़त में पेशेवर लुटेरा था, जो बार-बार अपने सिपाहियों के साथ आता था और जो इस लूट में मिलता था उसे लेकर चला जाता था.
पंडित नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘भारत की खोज’ में लिखा है, "महमूद एक लुटेरा था. धर्म को उसने लूटमार में एक शस्त्र की तरह इस्तेमाल किया था. आख़िरी बार वह हिंदुस्तानियों के हाथों ऐसा हारा कि उसे अपनी जान बचाकर भागने पर मजबूर होना पड़ा. उसके काफ़िले में जितनी औरते थीं वे यहीं के सिपाहियों के घरों में बस गईं."
महमूद के साथ गुजरात के सोमनाथ मंदिर का जिक्र भी इतिहास में मिलता है.
इस आक्रमण को इतिहास में धार्मिक विवाद का रूप भले ही दे दिया जाए, लेकिन पर्दे के पीछे की हक़ीक़त दूसरी है. लुटेरों के लालच या लोभ को मूरत या क़ुदरत से ज़्यादा धन-दौलत से मुहब्बत होती है और इस मुहब्बत में धर्म को बदनाम किया जाता है.
नरेश सक्सेना ने फ़ैज़ाबाद में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने पर एक कविता लिखी थी, कविता में वर्तमान के धर्मांतरण की तुलना अतीत के जुनून से की गई है, कविता की पंक्तियां हैं
इतिहास के बहुत से भ्रमों में सेएक यह भी हैकि महमूद ग़ज़नवी लौट गया थालौटा नहीं था वह-यहीं थासैंकड़ों बरस बाद अचानकवह प्रकट हुआ अयोध्या मेंसोमनाथ में किया था उसनेअल्लाह का काम तमामइस बार उसका नारा था-जयश्रीराम
महमूद ग़ज़नवी जिन औरतों और मर्दों को छोड़कर अपनी जान बचाकर भागा, उनकी औलादें कई-कई नस्लों के बाद कहाँ-कहाँ है, ईश्वर के किस रूप की पुजारी है, चर्च में उसकी स्तुति गाती है, मस्जिद में सर झुकाती हैं या मूरत के आगे दीप जलाती हैं. मैंने सैलाब नामक एक सीरियल के टाइटिल गीत में लिखा है.
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों सेकिस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं.
ख़ुदा की ज़मीन
कोई नगर हो या देश हो, उसमें बसने वाले या वहाँ से बाहर जाने वाले सब एक जैसे नहीं होते. गज़नी से महमूद भी भारत आया था और वे बुज़ुर्ग भी आए थे जो सारी दुनिया को एक ही ख़ुदा की ज़मीन मानते थे.
इन्हीं बुजुर्गों की नस्ल के एक मुहम्मद फ़तह खाँ के परिवार में, पंजाब के ज़िला होशियारपुर में 1928 में एक बेटे का जन्म हुआ. बाप ने उसका नाम मुहम्मद मुनीर ख़ान नियाज़ी रखा. अभी यह बच्चा मुश्किल से एक साल का ही था कि बाप अल्लाह को प्यारे हो गए.
बाप की मौत ने घर ख़ानदान के हालात ही नहीं बदले, बल्कि मुहम्मद मुनीर ख़ान नियाज़ी ने अपने चार लफ़्जों के नाम को दो लफ़्जी नाम में बदल दिया. अब इसमें न मुहम्मद था न ख़ान. सिर्फ़ दो लफ़्ज थे मुनीर नियाज़ी.
मुनीर नियाज़ी, फैज़ अहमद फैज़ और नूनकीम राशिद के बाद पाकिस्तान की आधुनिक उर्दू शायरी का सबसे बड़ा नाम है.
मुनीर अपने मिज़ाज, अंदाज़ और आवाज़ के लिहाज़ से अनोखे शायर थे. यह अनोखापन उनके शब्दों में भी नज़र आता है. शब्दों में पिरोए हुए विषयों में भी जगमगाता है और उस इमेजरी से भी नकाब उठाता है जो उनकी शायरी में एक भाषा की रिवायत में कई मुल्की और ग़ैरमुल्की भाषाओं की विरासत को दर्शाती है.
वह पैदायशी पंजाबी थे. पंजाब की अज़ीम लोक विरासत में शामिल सूफियाना इंसानियत, जिनका शुरूआती रूप बाबा फ़रीद के दोहो में बिखरा हुआ है, मुनीर नियाज़ी की नज्मों और ग़ज़लों की ज़ीनत है.
उनकी शायरी का केंद्रीय किरदार, समय-समय पर बदलती रियासत से दूर होकर उन राहों में चलता फिरता नज़र आता है जहाँ दरख़्त, इंसान, पहाड़, आसमान परिंदे, दरिंदे और नदियाँ एक ही ख़ानदान से सदस्य है और जो एक दूसरे के दुख-सुख में बराबर शरीक रहते हैं.
इस शायरी में ज़मीन और आसमान के बीच ज़िंदगी उन हैरतों में घिरी दिखाई देती है जो सदियों से सूफी संतो की इबादतों का दायरा रही हैं.
इन हैरतों की झिलमिलाहटों में न ज़मीन की सीमाएँ हैं, न विज्ञान की लानतों से गंदी होती फज़ाएँ हैं. इनमें मानव जीवन प्रकृति का चमत्कार है, जो सीधा और आसान नहीं है. गहरा और पुरइसरार है.
महमूद ग़ज़नवी तलवार के सिपाही थे और मुनीर नियाज़ी कायनात में कुदरत की रहमत की गवाही थे. उनकी रचनाओं की कुछ मिसालें देखिए.
अभी चाँद निकला नहींवह ज़रा देर में उन दरख्तों के पीछे से उभरेगा.और आसमाँ के बड़े चश्त को पार करने की एक और कोशिश करेगा (कोशिशे राख्गाँ)
गुम हो चले हो तुम तो बहुत ख़ुद में ए मुनीरदुनिया को कुछ तो अपना पता देना चाहिए
आदत सी बना ली है तुमने तो मुनीर अपनीजिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना
मुनीर नियाज़ी ने सोमनाथ मंदिर की दौलत की लालच में न अल्लाह का काम तमाम किया और न बाबरी मस्जिद को तोड़कर जय श्रीराम कहा.
उसने सिर्फ़ अपने लफ़्जों में प्रेम और अहिंसा के पैगंबरो-बाबा फ़रीद, वारिस शाह आदि का पैग़ाम आम किया.
मुनीर नियाज़ी (1828-1906) अपनी तबीयत की वजह से आबादी में तन्हाई का मार्सिया था. इस तन्हाई को बहलाने के लिए उन्हीं के एक इंटरव्यू के मुताबिक उन्होंने 40 बार इश्क किया था, लेकिन यह गिनती भी उनकी बेक़रारी को सुकून नहीं दे पाई. इस मुसलसल बेक़रारी के बारे में उन्होंने लिखा है:
इतनी आसाँ ज़िंदगी को इतना मुश्किल कर लियाजो उठा सकते न थे वह ग़म भी शामिल कर लिया
मुनीर नियाज़ी ने कई पाकिस्तानी फ़िल्मों में गीत भी लिखे थे, इनमें कुछ गीत अच्छे और नर्म लफ़्जों के कारण काफ़ी पसंद भी किए गए. कुछ गीतों के मुखड़े यूँ हैं:
उस बेवफ़ा का शहर है और हम हैं दोस्तो...
या फिर
कैसे-कैसे लोग हमारे दिल को जलाने आ जाते है
और एक यह भी,
जिसने मेरे दिल को दर्द दिया, उस शख़्स को मैंने भुला दिया
मुनीर नियाज़ी वक़्त और उसके ग़ैर-इंसानी बर्ताव से इतने उदास थे कि चालीस बार इश्क़ करने के बावजूद अपने माँ-बाप की इकलौती औलाद की तरह वह तमाम उम्र इकलौते ही रहे. उन्हें अपना नाम अजीज़ था कि इसमें किसी और की शिरकत उन्हें गवारा नहीं हुई. उनके वारिसों में उनकी बेवा के अलावा कोई और नहीं.
शाम आई है शराबे तेज़ पीना चाहिएहो चुकी है देर अब ज़ख्मों को सीना चाहिए।

निदा फ़ाजलीशायर और लेखक

सोमवार, 3 दिसंबर 2007

Review My Blog at HindiBlogs.org
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रविवार, 2 दिसंबर 2007

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किसी के इतने पास न जाके दूर जाना खौफ़ बन

कदम पीछे देखने परसीधा रास्ता भी खाई नज़र

को इतना अपना न बनाकि उसे खोने का डर लगा

डर के बीच एक दिन ऐसा न आयेतु पल पल खुद को ही खोने

के इतने सपने न देखके काली रात भी रन्गीली
खुले तो बर्दाश्त न होजब सपना टूट टूट कर बिखरने लगेकिसी को इतना प्यार न करके बैठे बैठे आन्ख नम हो जायेउसे गर मिले एक दर्दइधर जिन्दगी के दो पल कम हो जायेकिसी के बारे मे इतना न सोचकि सोच का मतलब ही वो बन जायेभीड के बीच भीलगे तन्हाई से जकडे गयेकिसी को इतना याद न करकि जहा देखो वोही नज़र आयेराह देख देख कर कही ऐसा न होजिन्दगी पीछे छूट जाये